नई दिल्ली। भारतीय घरों की रसोई का अहम हिस्सा और आयुर्वेद में सुपरफूड माना जाने वाला घी अब आपकी सेहत के लिए बड़ा खतरा बन सकता है। बनारस हिंदू यूनिवर्सिटी के इंडियन इंस्टीट्यूट ऑफ टेक्नोलॉजी के वैज्ञानिकों ने नकली घी को लेकर एक ऐसा चौंकाने वाला खुलासा किया है, जिसने देश के खाद्य सुरक्षा मानकों और जांच लैबोरेट्रीज पर बड़े सवाल खड़े कर दिए हैं। रिसर्च के मुताबिक, मिलावटखोरों ने अब घी के लैब टेस्ट को पास करने का एक तोड़ निकाल लिया है, जिससे नकली घी भी जांच में बिल्कुल शुद्ध साबित हो रहा है। गाजर के बीटा कैरोटीन से मिलावट, पकड़ने में लैब भी नाकामIIT (BHU) की इस स्टडी में सामने आया है कि मिलावट खोर अब घी में मिलावट को छिपाने के लिए रासायनिक रंगों के बजाय पूरी तरह से प्राकृतिक चीजों का इस्तेमाल कर रहे हैं। इस नए तरीके में गाजर के पिगमेंट (बीटा कैरोटीन) को नकली घी में मिलाया जा रहा है। बीटा कैरोटीन वही तत्व है जो गाजर को उसका प्राकृतिक रंग देता है। जब इसे वनस्पति या अन्य प्रतिबंधित फैट्स के साथ मिलाया जाता है, तो यह घी को हूबहू असली घी जैसा पीला रंग और बनावट दे देता है। इस रिसर्च का सबसे बड़ा और डराने वाला दावा यह है कि अगर घी में इस तकनीक से मिलावट की जाए, तो देश की आधुनिक फूड टेस्टिंग लैब्स भी इसे पकड़ नहीं पा रही हैं। लैब टेस्ट के नतीजों में इस मिलावटी घी के परिणाम पूरी तरह से शुद्ध और असली घी जैसे आ रहे हैं। इसका सीधा मतलब यह हुआ कि बाजार में बिक रहा जो घी लैब से पास होकर आपकी थाली तक पहुंच रहा है, वह भी नकली हो सकता है। वैज्ञानिकों और खाद्य सुरक्षा अधिकारियों की चेतावनी“मिलावटखोरों ने जांच एजेंसियों से बचने के लिए बेहद शातिर तरीका अपनाया है। बीटा कैरोटीन एक प्राकृतिक पिगमेंट है, इसलिए जब घी का सामान्य केमिकल एनालिसिस या स्पेक्ट्रोस्कोपिक टेस्ट किया जाता है, तो लैब के उपकरण इस अंतर को नहीं पकड़ पाते। यह सीधे तौर पर आम जनता के स्वास्थ्य के साथ खिलवाड़ है और हमें टेस्टिंग के पैमानों को तुरंत बदलना होगा।”— आईआईटी (बीएचयू) के वरिष्ठ शोधकर्ता आम जनता पर असर और आगे का रास्ताप्रमुख बाजारों में घी की शुद्धता को लेकर हमेशा से मांग ऊंची रहती है। त्योहारों और शादियों के सीजन में यह मांग दोगुनी हो जाती है। इस रिसर्च के सामने आने के बाद स्थानीय नागरिकों में चिंता साफ देखी जा रही है। मिलावटी घी के सेवन से लिवर, हार्ट और पाचन तंत्र से जुड़ी गंभीर बीमारियों का खतरा बढ़ जाता है। इस खुलासे के बाद अब स्थानीय खाद्य सुरक्षा प्रशासन (FSDA) पर दबाव बढ़ गया है। पारंपरिक जांच पद्धतियां फेल होने के बाद अब वैज्ञानिकों ने सुझाव दिया है कि घी की शुद्धता जांचने के लिए एडवांस्ड डीएनए बारकोडिंग या अधिक संवेदनशील क्रोमैटोग्राफी तकनीकों का इस्तेमाल अनिवार्य किया जाए, ताकि बीटा कैरोटीन की आड़ में बेचे जा रहे इस धीमे जहर को समय रहते पकड़ा जा सके। Post Views: 17 Please Share With Your Friends Also Post navigation तुलसी का पानी पीने से मिलते हैं सेहत को ये फायदे, यहां जानिए…