बिलासपुर। छत्तीसगढ़ हाईकोर्ट ने अंतरधार्मिक विवाह करने वाले एक वयस्क दंपती को राहत देते हुए स्पष्ट कहा है कि बालिग महिला और पुरुष को अपनी पसंद का जीवनसाथी चुनने का पूर्ण अधिकार है। यह अधिकार संविधान के अनुच्छेद 21 के तहत प्रदत्त जीवन और व्यक्तिगत स्वतंत्रता के मौलिक अधिकार का हिस्सा है। अदालत ने पुलिस प्रशासन को नवविवाहित जोड़े की सुरक्षा सुनिश्चित करने के निर्देश भी दिए हैं। मुख्य न्यायाधीश रमेश सिन्हा और न्यायमूर्ति रवींद्र कुमार अग्रवाल की खंडपीठ ने अंबिकापुर निवासी मोहम्मद जीशान (26) और आन्या सोनी (25) की याचिका पर सुनवाई करते हुए यह आदेश पारित किया। दोनों लंबे समय से एक-दूसरे को जानते थे और आपसी सहमति से विवाह करना चाहते थे। याचिका के अनुसार, अलग-अलग धर्मों से संबंध होने के कारण दोनों के परिवार इस रिश्ते का विरोध कर रहे थे।

विरोध बढ़ने पर दोनों दिसंबर 2023 में दिल्ली गए और 6 दिसंबर को शाहदरा जिला मजिस्ट्रेट कार्यालय में विधिसम्मत विवाह कर लिया। विवाह के बाद से उन्हें लगातार परिवार की ओर से धमकियां मिलने लगीं। दंपती ने सम्मान के नाम पर हिंसा (ऑनर किलिंग) की आशंका जताते हुए यह भी आरोप लगाया कि उन्हें झूठे आपराधिक मामलों में फंसाने की धमकी दी जा रही थी। दंपती ने पुलिस से सुरक्षा की मांग की थी, लेकिन अपेक्षित कार्रवाई नहीं होने पर अधिवक्ता विवेक अग्रवाल के माध्यम से हाईकोर्ट में रिट याचिका दायर की।

सुनवाई के दौरान राज्य शासन की ओर से कहा गया कि धमकियों से जुड़े आरोप सामान्य और अस्पष्ट हैं, इसलिए याचिका स्वीकार नहीं की जानी चाहिए। हालांकि हाईकोर्ट ने इस तर्क को स्वीकार नहीं किया। अदालत ने अपने आदेश में कहा कि यदि दो बालिग व्यक्ति अपनी स्वतंत्र इच्छा से विवाह करते हैं, तो किसी भी व्यक्ति या परिवार को उनके वैवाहिक जीवन में हस्तक्षेप करने का अधिकार नहीं है।

खंडपीठ ने सर्वोच्च न्यायालय के चर्चित लता सिंह बनाम उत्तर प्रदेश राज्य (2006) मामले का उल्लेख करते हुए कहा कि अंतरजातीय और अंतरधार्मिक विवाह समाज में सकारात्मक बदलाव लाने वाले कदम हैं तथा ऐसे विवाह जातिगत और सामाजिक भेदभाव को कमजोर करने में सहायक होते हैं। हाईकोर्ट ने संबंधित पुलिस अधीक्षक और थाना प्रभारी को निर्देश दिया कि दंपती के जीवन, स्वतंत्रता और संपत्ति की सुरक्षा सुनिश्चित की जाए। यदि भविष्य में दंपती किसी प्रकार की शिकायत दर्ज कराते हैं, तो उस पर तत्काल कार्रवाई की जाए और कानून के अनुसार आवश्यक सुरक्षा उपाय किए जाएं। साथ ही अदालत ने असंतुष्ट परिजनों को चेतावनी देते हुए कहा कि वे दंपती के शांतिपूर्ण वैवाहिक जीवन में किसी प्रकार का हस्तक्षेप न करें। न्यायालय ने स्पष्ट किया कि परिवार को विवाह से असहमति हो सकती है, लेकिन इसके आधार पर धमकी, उत्पीड़न या हिंसा किसी भी स्थिति में स्वीकार्य नहीं है।

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By Chhattisgarh Kranti

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