हरियाली अमावस्या : हिंदू धर्म परंपरा में पितरों की आत्मा की शांति और वंश वृद्धि के लिए अमावस्या तिथि का विशेष महत्व है। श्रावण मास में आने वाली हरियाली अमावस्या को तंत्र-मंत्र, दान-पुण्य और पितृ कर्मों के लिए अत्यंत फलदायी माना जाता है। धार्मिक विद्वानों के अनुसार, इस दिन केवल सामान्य तर्पण ही नहीं, बल्कि नान्दीमुख श्राद्ध करने का विशेष विधान है। मान्यता है कि इस विशेष श्राद्ध से पीढ़ियों से चले आ रहे पितृ दोष समाप्त होते हैं और परिवार में मांगलिक कार्यों के मार्ग खुलते हैं। क्या है नान्दीमुख श्राद्ध और क्यों माना जाता है इसे खास? धार्मिक ग्रंथों में नान्दीमुख श्राद्ध को सामान्य मृत श्राद्ध से भिन्न बताया गया है। संस्कृत में ‘नांदी’ का अर्थ आनंद और ‘मुख’ का अर्थ शुरुआत या प्रवेश द्वार होता है। जब भी घर में कोई शुभ कार्य, विवाह, मुंडन या गृह प्रवेश जैसे मांगलिक अनुष्ठान आयोजित होते हैं, तब पितरों का आशीर्वाद प्राप्त करने के लिए नान्दीमुख श्राद्ध किया जाता है। हरियाली अमावस्या के दिन इस श्राद्ध को करने से कार्य सिद्धि में आने वाली अज्ञात बाधाएं दूर होती हैं। शास्त्रों के अनुसार, इस अनुष्ठान के दौरान पूर्वजों का आह्वाहन केवल शोक व्यक्त करने के लिए नहीं, बल्कि उन्हें आनंदित कर उनका आशीर्वाद मांगने के लिए किया जाता है। नान्दीमुख श्राद्ध की विधि और मुख्य चरण शिव पुराण और अन्य धर्म ग्रंथों के अनुसार, नान्दीमुख श्राद्ध की प्रक्रिया अत्यंत पवित्र और शास्त्रोक्त नियमों से बंधी होती है: प्रारंभिक पूजन: सबसे पहले पवित्रीकरण, आचमन, शिखा बंधन और प्राणायाम के साथ संकल्प लिया जाता है। मातृका एवं वसोर्धारा पूजन: इस अनुष्ठान में सर्वप्रथम मातृ शक्तियों का पूजन किया जाता है। इसके बाद वसोर्धारा कर्मकांड संपन्न होता है। पिंडदान एवं आमान्न श्राद्ध: सपिण्ड, पिंड रहित और आमान्न (कच्चा अनाज) दान का विधान है। भगवान विष्णु का स्मरण: श्राद्ध के दौरान श्री हरि विष्णु के नाम का जाप और ध्यान किया जाता है, जिससे आत्मा को बैकुंठ लोक में स्थान मिलता है। ब्राह्मण भोज एवं आशीर्वाद: अंत में योग्य ब्राह्मणों को भोजन कराकर वस्त्र एवं दक्षिणा दी जाती है और परिवार की उन्नति का आशीर्वाद लिया जाता है। आम नागरिकों पर प्रभाव और इसका महत्व जो लोग लंबे समय से गृह कलेश, व्यापार में घाटे या संतान प्राप्ति में रुकावट जैसी समस्याओं का सामना कर रहे हैं, उनके लिए हरियाली अमावस्या पर यह अनुष्ठान अत्यंत फलदायी साबित होता है। काशी और हरिद्वार जैसे प्रमुख तीर्थ स्थलों पर इस दिन विशेष पूजा-अर्चना का आयोजन होता है। धर्मशास्त्रों के अनुसार, श्रद्धापूर्वक किया गया यह एक कर्म पूरे कुल को पितृ ऋण से मुक्ति दिलाता है। Post Views: 15 Please Share With Your Friends Also Post navigation श्रावण मास शिवरात्रि विशेष: 9 से 15 अगस्त तक ग्रहों का दुर्लभ संयोग और आपका साप्ताहिक राशिफल