रायपुर। प्रदेश में अब बड़े पैमाने पर कचरा पैदा करने वाले संस्थानों पर डिजिटल नजर रखी जाएगी। होटल, मॉल, अस्पताल, बस स्टैंड, बड़ी कॉलोनियां और सरकारी दफ्तर अब कचरा प्रबंधन से बच नहीं सकेंगे। शासन जियो-टैगिंग के जरिए हर बड़े वेस्ट जनरेटर की निगरानी करेगा।

केंद्रीय प्रदूषण नियंत्रण बोर्ड के निर्देश के बाद नगरीय निकायों ने ऐसे संस्थानों की सूची तैयार करना शुरू कर दिया है, जो रोजाना 100 किलो या उससे ज्यादा ठोस कचरा पैदा करते हैं। इसके लिए एक विशेष ऑनलाइन मॉनिटरिंग सिस्टम भी विकसित किया जा रहा है। अनुमान है कि प्रदेश के करीब 1.15 लाख सरकारी, निजी और व्यावसायिक संस्थान इस दायरे में आएंगे। अधिकारियों को वार्ड स्तर पर सर्वे कर सूची तैयार करने की जिम्मेदारी दी गई है।

नए नियमों के मुताबिक अब कोई भी बड़ी हाउसिंग सोसायटी, अस्पताल, स्कूल, बाजार या प्रोजेक्ट तब तक मंजूरी नहीं पाएगा, जब तक वह अपने परिसर में कचरा प्रबंधन के लिए अलग जगह आरक्षित नहीं करेगा। पर्यावरण एनओसी और प्रोजेक्ट सर्टिफिकेट भी इसी शर्त पर जारी होंगे।

नियमों का उल्लंघन करने वालों पर भारी जुर्माने की कार्रवाई की जाएगी। जिन संस्थानों से रोजाना 5 टन से अधिक कचरा निकलता है, उन्हें अलग से पर्यावरण विभाग में आवेदन करना होगा। बड़े होटल, रिसॉर्ट, अस्पताल, शॉपिंग मॉल, कॉलेज, विश्वविद्यालय, रेलवे स्टेशन, एयरपोर्ट, स्टेडियम, बड़ी मंडियां और विवाह स्थल इस नई व्यवस्था के दायरे में शामिल होंगे। सरकार फल, सब्जी, मटन और मछली बाजारों के पास बायोमिथिनेशन प्लांट लगाने को भी बढ़ावा दे रही है, ताकि कचरे से गैस और खाद तैयार की जा सके। वहीं पार्कों और उद्योगों को अपने परिसर में ही कचरे की प्रोसेसिंग करनी होगी।

प्रदेश में हर दिन करीब 3800 टन कचरा निकलता है, जबकि अकेले रायपुर में यह आंकड़ा 700 से 750 टन प्रतिदिन है। रायपुर में हर महीने कचरा प्रोसेसिंग पर 5 से 6 करोड़ रुपये खर्च किए जाते हैं। अधिकारियों के मुताबिक 10 लाख से ज्यादा आबादी वाले शहरों को 31 मार्च 2027 तक इस पूरी प्रक्रिया को अनिवार्य रूप से पूरा करना होगा।

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By Chhattisgarh Kranti

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