क्या फास्टिंग से थायरॉइड हेल्थ पर पड़ सकता है बुरा असर? जानिए महिलाओं की हेल्थ और फर्टिलिटी पर Thyroid का प्रभाव थायरॉइड से जुड़ी समस्याएं उन हार्मोनल समस्याओं में से हैं जो महिलाओं की फर्टिलिटी पर असर डाल सकती हैं. कभी-कभी, साफ़ लक्षण दिखने से पहले ही गर्भधारण में दिक्कतें आने लगती हैं. थायराइड हार्मोन में असंतुलन मेटाबॉलिज्म, एनर्जी लेवल, पीरियड्स के रेगुलर होने और ओव्यूलेशन पर असर डाल सकता है, जिससे गर्भधारण करना मुश्किल हो सकता है. कुछ महिलाओं को थकान, बिना किसी साफ वजह के वजन में बदलाव या अनियमित पीरियड्स का अनुभव हो सकता है, जबकि कुछ महिलाओं में बहुत कम या कोई लक्षण नहीं दिखते हैं. अहमदाबाद में बिरला फर्टिलिटी एंड IVF की फर्टिलिटी स्पेशलिस्ट डॉ. निमिषा शांतिलाल पांड्या बताती हैं कि त्योहारों के मौसम में खान-पान की आदतों और व्रत रखने के रूटीन में बदलाव आते हैं. इसलिए, थायराइड हेल्थ और फर्टिलिटी के बीच के संबंध को समझना बहुत जरूरी हो जाता है. थायरॉइड की बीमारियां महिलाओं की हेल्थ और फर्टिलिटी पर कैसे असर डालती हैं डॉ. निमिषा शांतिलाल पांड्या का कहना है कि थायरॉइड ग्लैंड ऐसे हॉर्मोन बनाती है जो शरीर के कई जरूरी कामों को रेगुलेट करते हैं. अंडरएक्टिव थायरॉइड (हाइपोथायरॉइडिज्म) से थकान, वजन बढ़ना, बाल पतले होना और पीरियड्स में ज्यादा या अनियमितता हो सकती है. ओवरएक्टिव थायरॉइड (हाइपरथायरॉइडिज्म) से बिना किसी वजह के वजन कम होना, दिल की धड़कन तेज होना, एंग्जायटी और पीरियड्स में अनियमितता हो सकती है. दोनों ही कंडीशन ओव्यूलेशन में रुकावट डाल सकती हैं और महिला की कंसीव करने की क्षमता पर असर डाल सकती हैं. कुछ महिलाओं को सबक्लिनिकल हाइपोथायरॉइडिज्म हो सकता है, यह एक ऐसी कंडीशन है जिसमें थायरॉइड हॉर्मोन का लेवल नॉर्मल रहता है लेकिन थायरॉइड-स्टिमुलेटिंग हॉर्मोन (TSH) का लेवल बढ़ा हुआ होता है. इस कंडीशन में अक्सर कोई साफ लक्षण नहीं दिखते, और फर्टिलिटी पर इसके असर पर रिसर्च जारी है. थायरॉइड की बीमारियां महिलाओं की हेल्थ और फर्टिलिटी पर कैसे असर डालती हैं डॉ. निमिषा शांतिलाल पांड्या के अनुसार, थायरॉइड ग्लैंड ऐसे हॉर्मोन बनाती है जो शरीर के कई जरूरी कामों को रेगुलेट करते हैं. अंडरएक्टिव थायरॉइड (हाइपोथायरॉइडिज्म) से थकान, वजन बढ़ना, बाल पतले होना और पीरियड्स में ज्यादा या अनियमितता हो सकती है. ओवरएक्टिव थायरॉइड (हाइपरथायरॉइडिज्म) से बिना किसी वजह के वजन कम होना, दिल की धड़कन तेज होना, एंग्जायटी और पीरियड्स में अनियमितता हो सकती है. दोनों ही कंडीशन ओव्यूलेशन में रुकावट डाल सकती हैं और महिला की कंसीव करने की क्षमता पर असर डाल सकती हैं. कुछ महिलाओं को सबक्लिनिकल हाइपोथायरॉइडिज्म हो सकता है, यह एक ऐसी कंडीशन है जिसमें थायरॉइड हॉर्मोन का लेवल नॉर्मल रहता है लेकिन थायरॉइड-स्टिमुलेटिंग हॉर्मोन (TSH) का लेवल बढ़ा हुआ होता है। इस कंडीशन में अक्सर कोई साफ़ लक्षण नहीं दिखते, और फर्टिलिटी पर इसके असर पर रिसर्च जारी है. यह साइलेंट इम्बैलेंस कितना आम है डॉ. निमिषा शांतिलाल पांड्या का कहना है कि गर्भपात या कंसीव करने में कठिनाई (सब-फर्टिलिटी) का इतिहास रखने वाली 19,000 से ज्यादा महिलाओं पर की गई रिसर्च में, जिनमें से किसी को भी पहले से थायरॉइड की बीमारी नहीं थी. यह पाया गया कि जब 2.5 mIU/L का कट-ऑफ इस्तेमाल किया गया, तो लगभग हर पांच में से एक महिला में TSH का लेवल थोड़ा बढ़ा हुआ था. कई महिलाओं को अपने थायरॉइड की समस्या का पता तब चलता है जब उन्हें कंसीव करने में उम्मीद से ज्यादा समय लगता है. क्या त्योहारों के दौरान व्रत रखने से थायरॉइड की सेहत पर असर पड़ सकता है? हां, लंबे समय तक या बहुत ज्यादा उपवास करने से एक्टिव थायरॉइड हार्मोन (T3) का लेवल कम हो सकता है. त्योहारों के दौरान, लोग अक्सर अपने रेगुलर खाने की जगह साबूदाना, आलू और फल जैसी चीजें खाते हैं. इससे थायरॉइड मरीजों (खासकर जिन्हें हाइपोथायरायडिज्म है) की स्थिति पर असर पड़ सकता है, क्योंकि ऐसे खाने में कार्बोहाइड्रेट (स्टार्च) तो बहुत ज्यादा होता है, लेकिन प्रोटीन, फाइबर और जरूरी पोषक तत्व बहुत कम होते हैं. इसके अलावा, उपवास में इस्तेमाल होने वाले सेंधा नमक में आयोडीन नहीं होता है. चूंकि थायरॉइड हार्मोन बनाने के लिए आयोडीन जरूरी है, इसलिए सही मात्रा में इसका सेवन करना बहुत जरूरी है. कभी-कभार उपवास करने से थायरॉइड की बीमारी नहीं होती है. लेकिन, लंबे समय तक खाने-पीने पर रोक लगाने से (जिस दौरान अक्सर आयोडीन से भरपूर खाने की चीजों से परहेज किया जाता है) शरीर में पोषक तत्वों की कमी हो सकती है. कैलोरी की बहुत ज्यादा कमी होने पर शरीर ऊर्जा बचाने के लिए अपने मेटाबॉलिज्म को धीमा कर सकता है. उपवास या तनाव से शरीर में कोर्टिसोल का लेवल बढ़ सकता है, जो T4 हार्मोन को एक्टिव T3 हार्मोन में बदलने की प्रक्रिया में रुकावट डालता है. खान-पान की आदतों में बदलाव या उपवास के दौरान समय पर दवा न लेने से थायरॉइड की दवा के असर और शरीर द्वारा उसे सोखने की क्षमता पर बुरा असर पड़ सकता है. ऐसे मामलों में, उपवास के दौरान दूध, दही और अन्य पौष्टिक चीजें शामिल करने से पोषक तत्वों का संतुलन बनाए रखने में मदद मिल सकती है. महिलाओं को थायरॉइड की समस्याओं के लिए कब टेस्ट करवाना चाहिए? जिन महिलाओं को अनियमित मासिक धर्म, गर्भधारण में कठिनाई, बार-बार गर्भपात, लगातार थकान या बिना किसी स्पष्ट कारण के वजन में बदलाव जैसे लक्षण महसूस हों, उन्हें थायरॉइड टेस्ट के बारे में अपने डॉक्टर से सलाह लेनी चाहिए. जिन महिलाओं के परिवार में थायरॉइड की बीमारी या ऑटोइम्यून स्थितियों का इतिहास रहा है, उनके लिए भी टेस्ट करवाना सही हो सकता है. आमतौर पर, पहला कदम TSH ब्लड टेस्ट होता है और जरूरत पड़ने पर आगे और टेस्ट किए जाते हैं. इलाज इस बात पर निर्भर करता है कि थायरॉइड की समस्या कितनी गंभीर है, मेडिकल हिस्ट्री क्या है और गर्भावस्था की क्या योजना है. इस त्योहार के मौसम में, थायरॉइड की सेहत पर ध्यान देना प्रजनन स्वास्थ्य (रिप्रोडक्टिव हेल्थ) की योजना का एक अहम हिस्सा हो सकता है. थायरॉइड की बीमारियों का जल्दी पता लगाना और उनका सही मैनेजमेंट महिलाओं को अपनी फर्टिलिटी के बारे में सोच-समझकर फैसले लेने में मदद कर सकता है. Post Views: 10 Please Share With Your Friends Also Post navigation क्या IVF प्रोसेस के दौरान रख रहे हैं व्रत? जान लें आपको अपने डॉक्टर से क्या बात करनी चाहिए