रायपुर। छत्तीसगढ़ विधानसभा में आज मंत्री और कलेक्टर के अधिकारों को लेकर जोरदार बहस छिड़ गई। प्रश्नकाल के दौरान उठे एक मुद्दे ने अचानक राजनीतिक रंग ले लिया, जब विपक्ष और सत्ता पक्ष के बीच अधिकारों की सीमाओं पर तीखी नोकझोंक शुरू हो गई। दरअसल, प्रश्नकाल में चौथे नंबर के सवाल पर चर्चा चल रही थी। कांग्रेस विधायक व्यास कश्यप ने CSR (कॉर्पोरेट सोशल रिस्पॉन्सिबिलिटी) मद से होने वाले कार्यों में कलेक्टर की कथित मनमानी और जनप्रतिनिधियों की उपेक्षा का मुद्दा उठाया। अपने पूरक सवाल में व्यास कश्यप ने उद्योग मंत्री लखनलाल देवांगन से कहा “किसी भी औद्योगिक इकाइयों की एक सीमा होती है, लेकिन सांसद ने सीमा से बाहर के गांवों में सीएसआर मद से काम करने की अनुशंसा की है और कलेक्टर की तरफ से मनमाने तरीके से उस औद्योगिक क्षेत्र के बाहर के गांवों में सीएसआर मद की राशि के ब्याज से विकास कार्य कराये गये हैं। क्या इस तरह से किसी औद्योगिक सीमा क्षेत्र से बाहर के गांवों में विकास कार्य कराना उचित है। अगर कलेक्टर को मनमाने तरीके से ही काम कराना है, तो फिर समिति का क्या औचित्य है। मैंने अटल बिहारी वाजपेयी ताप विद्युत से प्रभावित गांवों के लिए अनुशंसा की है, क्या मेरे अनुशंसा पर काम होगा? आप यहीं पर घोषणा कर दीजिये।” इस पर मंत्री लखनलाल देवांगन ने जवाब देते हुए कहा : “मुझे घोषणा करने का अधिकार नहीं है, आप बोलते हैं कि कलेक्टर के साथ बैठते हैं, तो उनसे विचार-विमर्श करके, काम को करवाईये आप।” मंत्री का यह जवाब विपक्ष को असहज कर गया। चर्चा समाप्त होते ही पूर्व मुख्यमंत्री भूपेश बघेल अपनी सीट से खड़े हुए और तीखी प्रतिक्रिया दी। उन्होंने कहा: “मंत्रीजी ने कहा है कि, मैं कलेक्टर को निर्देशित नहीं कर सकता… और कलेक्टर के साथ बैठ जाईये। तो, हमलोग कलेक्टर के पास ही बैठते हैं, यहां बैठने का कोई औचित्य थोड़े ना है। जब सब काम कलेक्टर को ही करना है और आप निर्देश नहीं दे सकते, तो किस बात के लिए आप मंत्री बने हैं।” भूपेश बघेल की इस टिप्पणी के बाद सदन का माहौल और अधिक गरमा गया। जवाब में मंत्री लखनलाल देवांगन ने कहा: “आप स्वयं मुख्यमंत्री रहे हैं, उन्होंने घोषणा करने की बात कही थी, इसलिए मैंने कहा, कि मैं घोषणा नहीं कर सकता।” मंत्री के इस स्पष्टीकरण से विपक्ष संतुष्ट नहीं हुआ। भूपेश बघेल ने पुनः खड़े होकर तीखे स्वर में कहा: “मंत्री की घोषणा के पालन करने की बाध्यता कलेक्टर की है। अगर मंत्री ने किसी बात को कह दिया, तो कलेक्टर को वो कार्य करना होगा। कलेक्टर कैसे नहीं करेगा… इसका मतलब ये हुआ कि कलेक्टर पर कंट्रोल नहीं है आपका।” सदन में हुई यह बहस केवल CSR मद के उपयोग तक सीमित नहीं रही, बल्कि प्रशासनिक अधिकारों और जनप्रतिनिधियों की भूमिका पर व्यापक चर्चा का कारण बन गई। विपक्ष ने जहां इसे मंत्री के अधिकारों की सीमितता से जोड़ा, वहीं सत्ता पक्ष ने इसे प्रक्रियात्मक स्पष्टता का मामला बताया। Post Views: 29 Please Share With Your Friends Also Post navigation अंबिकापुर में पीलिया से 2 की मौत, कांग्रेस ने घेरा निगम कार्यालय, नवागढ़ इलाके में 60 मरीज CG TRANSFER NEWS: बड़ा प्रशासनिक फेरबदल, तहसीलदार-नायब तहसीलदारों के तबादले