नई दिल्ली। सावन के पवित्र महीने में देश भर के शिवालयों में भक्तों की भारी भीड़ उमड़ रही है। महादेव की आराधना के इस विशेष काल में शिवलिंग पर जल और बेलपत्र के साथ-साथ भांग और धतूरा विशेष रूप से अर्पित किया जा रहा है। सनातन परंपरा में इन औषधीय वनस्पतियों को शिव पूजा का अनिवार्य हिस्सा माना गया है। ज्योतिषाचार्यों के अनुसार, सावन मास में इन विशिष्ट सामग्रियों को अर्पित करने से महादेव अपने भक्तों के सभी संकटों को दूर कर जीवन में सुख, शांति और समृद्धि का वरदान देते हैं।

समुद्र मंथन और हलाहल विष की पौराणिक कथा
पौराणिक मान्यताओं के अनुसार, सावन के महीने में ही देवताओं और असुरों के बीच अमृत प्राप्ति के लिए समुद्र मंथन हुआ था। इस मंथन के दौरान चौदह रत्नों से पहले एक अत्यंत विनाशकारी और भयंकर विष निकला, जिसे हलाहल विष कहा गया। इस विष की अग्नि से त्रिलोकी में हाहाकार मच गया। सृष्टि को विनाश से बचाने के लिए भगवान शिव ने उस विष का पान कर लिया। विष के प्रभाव से महादेव का कंठ पूरी तरह नीला पड़ गया, जिसके बाद से उन्हें नीलकंठ नाम से पुकारा गया।

विष ग्रहण करने के बाद भगवान शिव के शरीर में तीव्र जलन होने लगी। महादेव के शरीर के तापमान और उस दाह (जलन) को शांत करने के लिए सभी देवताओं ने उन पर जल, शीतल जड़ी-बूटियां, बेलपत्र, भांग और धतूरा अर्पित करना शुरू किया। इन शीतल और औषधीय तत्वों के प्रभाव से शिव जी की आंतरिक अग्नि शांत हुई। तभी से सावन के महीने में शिवलिंग पर भांग-धतूरा और जल चढ़ाने की यह प्राचीन परंपरा निरंतर चली आ रही है।

काशी के विद्वानों और शास्त्रियों का मत
“महादेव को प्रसन्न करने के लिए किसी छप्पन भोग या बहुमूल्य आभूषणों की आवश्यकता नहीं होती। वे केवल भाव, जल और जंगली वनस्पतियों जैसे धतूरा, भांग और बेलपत्र से ही संतुष्ट हो जाते हैं। आयुर्वेद की दृष्टि से भी धतूरा और भांग में ऊष्णता को सोखने के गुण होते हैं, जो प्रतीकात्मक रूप से शिव जी के कंठ की जलन को शांत करते हैं।”
— मुख्य अर्चक एवं वैदिक विद्वान, वाराणसी

भक्तों के जीवन पर प्रभाव और पूजा का नियम
धार्मिक मान्यता है कि पूजा के दौरान शिवलिंग पर भांग और धतूरा अर्पित न करने से शिव आराधना अधूरी मानी जाती है। सावन के सोमवार या दैनिक पूजा में इन्हें अर्पित करने से जातक के करियर में आ रही बाधाएं दूर होती हैं और घर में सकारात्मक ऊर्जा का प्रवाह बढ़ता है। शास्त्रों के अनुसार, धतूरा अर्पित करते समय उसका मुख (डंठल वाला हिस्सा) हमेशा भक्त की विपरीत दिशा में यानी जलाधारी की ओर होना चाहिए। इन नियमों का पालन करने से मानसिक तनाव से मुक्ति मिलती है और कुंडली के राहु-केतु दोषों का शमन होता है।

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By Chhattisgarh Kranti

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