बिलासपुर। छत्तीसगढ़ हाईकोर्ट ने एक महत्वपूर्ण फैसले में स्पष्ट किया है कि यदि किसी संपत्ति का मालिकाना विवाद पहले से ही सक्षम सिविल कोर्ट में लंबित हो और निचली वैधानिक प्राधिकरण (स्टैच्यूटरी अथॉरिटीज) तथ्यों पर समवर्ती निष्कर्ष दे चुके हों, तो हाईकोर्ट अपने पर्यवेक्षण अधिकार (अनुच्छेद 227) के तहत हस्तक्षेप नहीं करेगा और न ही साक्ष्यों की दोबारा जांच करेगा।

यह फैसला रायपुर के भीम नगर निवासी हलीमा बेगम की याचिका पर सुनाया गया। याचिका में उन्होंने रफीक अहमद एवं अन्य के खिलाफ किरायेदारी के आधार पर दुकान खाली कराने (बेदखली) और बकाया किराया वसूली की मांग की थी। याचिकाकर्ता ने छत्तीसगढ़ रेंट कंट्रोल एक्ट 2011 के तहत रेंट कंट्रोल अथॉरिटी और रेंट कंट्रोल ट्रिब्यूनल के आदेशों को चुनौती दी थी।

मामले की सुनवाई करते हुए खंडपीठ, जिसमें मुख्य न्यायाधीश रमेश सिन्हा और न्यायमूर्ति बिभु दत्ता गुरु शामिल थे, ने दोनों निचली प्राधिकरणों के फैसलों को सही ठहराते हुए याचिका खारिज कर दी।

विवाद एक दुकान को लेकर शुरू हुआ था। हलीमा बेगम ने दावा किया कि उन्होंने 14 फरवरी 2000 को रजिस्टर्ड बिक्री विलेख (सेल डीड) के जरिए यह संपत्ति खरीदी थी। उनके अनुसार, प्रतिवादी के पूर्वज इस दुकान में किराए पर किराना दुकान चलाते थे और उनकी मृत्यु के बाद भी प्रतिवादी वहीं काबिज रहे। याचिकाकर्ता का आरोप था कि प्रतिवादी नियमित रूप से किराया नहीं दे रहे थे और काफी बकाया जमा हो गया था।

वहीं, प्रतिवादियों ने इस दावे को खारिज करते हुए इसे पारिवारिक संपत्ति का विवाद बताया। उनका कहना था कि यह मकान मालिक और किरायेदार का मामला नहीं, बल्कि संयुक्त परिवार की संपत्ति से जुड़ा विवाद है। उन्होंने यह भी कहा कि याचिकाकर्ता किरायेदारी साबित करने के लिए कोई ठोस दस्तावेज—जैसे किराया रसीद, एग्रीमेंट या भुगतान का प्रमाण—पेश नहीं कर सके।

रेंट कंट्रोल अथॉरिटी ने अपने फैसले में माना कि याचिकाकर्ता संपत्ति का मालिक है, लेकिन केवल मालिकाना हक से किरायेदारी साबित नहीं होती। अथॉरिटी ने यह भी पाया कि दोनों पक्ष एक ही परिवार से जुड़े हैं और किरायेदारी के पर्याप्त साक्ष्य नहीं हैं। इसी आधार पर बेदखली की मांग खारिज कर दी गई थी। बाद में ट्रिब्यूनल ने भी इसी निष्कर्ष को बरकरार रखा।

हाईकोर्ट ने अपने फैसले में कहा कि भारतीय संविधान का अनुच्छेद 227 के तहत हस्तक्षेप केवल सीमित परिस्थितियों में ही किया जा सकता है। जब निचली अदालतें तथ्यों पर एक जैसी राय दे चुकी हों, तो उनमें हस्तक्षेप करना उचित नहीं है। कोर्ट ने यह भी उल्लेख किया कि संपत्ति के मालिकाना हक को लेकर सिविल कोर्ट में मामला पहले से लंबित है और उस पर अपील भी विचाराधीन है।

कोर्ट ने यह भी गौर किया कि संपत्ति खरीदने के बाद लगभग 15 वर्षों तक किराया मांगने का कोई ठोस रिकॉर्ड प्रस्तुत नहीं किया गया, जिससे याचिकाकर्ता का दावा कमजोर पड़ता है।

अंततः हाईकोर्ट ने याचिका खारिज करते हुए स्पष्ट किया कि इस फैसले का असर सिविल कोर्ट में लंबित टाइटल विवाद पर नहीं पड़ेगा। यह निर्णय भविष्य में ऐसे मामलों के लिए एक महत्वपूर्ण न्यायिक दृष्टांत के रूप में देखा जा रहा है।

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By Chhattisgarh Kranti

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