नई दिल्ली। भागदौड़ भरी कॉर्पोरेट लाइफस्टाइल में अक्सर हम खुद को एक मशीन समझ लेते हैं। लेकिन शरीर और दिमाग की अपनी एक सीमा होती है। कॉर्पोरेट मेंटल हेल्थ कंसल्टेंट और प्रसिद्ध मनोवैज्ञानिक डॉ. के अनुसार, बर्नआउट कोई रातों-रात होने वाली घटना नहीं है। यह एक धीमी प्रक्रिया है, जिसके संकेत हमारा दिमाग काफी पहले देना शुरू कर देता है। यदि आप लगातार थकान महसूस कर रहे हैं और काम का बोझ खत्म नहीं हो रहा, तो यह समय रुककर आत्मनिरीक्षण करने का है। जब दिमाग देने लगे जवाब: ‘डिसीजन फटीग’ को पहचानें डॉ. के मुताबिक, जब मानसिक थकान अपनी चरम सीमा पर पहुंचती है, तो सबसे पहला प्रहार आपकी निर्णय लेने की क्षमता पर होता है। इसे मनोवैज्ञानिक भाषा में ‘डिसीजन फटीग’ कहा जाता है। इसमें व्यक्ति को बहुत छोटे और सामान्य फैसले लेने में भी भारी मानसिक दबाव महसूस होने लगता है। फोकस में कमी: काम के दौरान एकाग्रता खत्म होना और एक ही पैराग्राफ को बार-बार पढ़ने के बावजूद समझ न आना। मेमोरी लैप्स: छोटी-छोटी बातें, जैसे मीटिंग का समय या किसी का नाम भूल जाना। कॉग्निटिव ओवरलोड: दिमाग का जानकारी को प्रोसेस करने की गति का धीमा हो जाना। Post Views: 14 Please Share With Your Friends Also Post navigation अब हफ्ते में केवल 2 दिन का वर्कआउट भी रखेगा तंदुरुस्त, नई स्टडी ने तोड़ा रोज जिम जाने का मिथक