सनातन परंपरा में ‘गुरु’ को केवल एक शिक्षक नहीं, बल्कि ईश्वर तक पहुँचने का सुगम मार्ग माना गया है। जीवन के अंधकार से निकालकर प्रकाश की ओर ले जाने वाली इसी दिव्य ऊर्जा को समर्पित पर्व है—गुरु पूर्णिमा। आषाढ़ मास की शुक्ल पक्ष की पूर्णिमा को मनाया जाने वाला यह त्योहार केवल एक धार्मिक उत्सव नहीं, बल्कि अपने पथप्रदर्शकों, आचार्यों और गुरुजनों के प्रति कृतज्ञता व्यक्त करने का पावन अवसर है।इसे ‘व्यास पूर्णिमा’ भी कहा जाता है। आइए जानते हैं कि इस दिन का ऐतिहासिक महत्व क्या है और इसे मनाने की सही विधि क्या है। क्यों कहा जाता है इसे ‘व्यास पूर्णिमा’? पौराणिक मान्यताओं के अनुसार, आषाढ़ पूर्णिमा के दिन ही महर्षि वेदव्यास जी का प्राकट्य हुआ था। महर्षि वेदव्यास सनातन संस्कृति के वे महान स्तंभ हैं, जिन्होंने: वेदों का वर्गीकरण किया: उन्होंने अनत ज्ञानराशि को ऋग्वेद, यजुर्वेद, सामवेद और अथर्ववेद में विभाजित किया।महाभारत व पुराणों की रचना की: उन्होंने 18 पुराणों और विश्व के सबसे बड़े महाकाव्य ‘महाभारत’ की रचना की। वेदों और पुराणों का ज्ञान मानव जाति को देने के कारण महर्षि वेदव्यास जी को ‘प्रथम जगद्गुरु’ की उपाधि दी गई। यही कारण है कि इस दिन सबसे पहले व्यास जी का पूजन किया जाता है और उनके प्रति सम्मान प्रकट करने के लिए इसे ‘व्यास पूर्णिमा’ कहते हैं। विभिन्न परंपराओं में गुरु पूर्णिमा का महत्व गुरु पूर्णिमा का पर्व केवल सनातन धर्म तक सीमित नहीं है, बल्कि यह अन्य भारतीय दर्शनों में भी गहरा आध्यात्मिक महत्व रखता है: सनातन धर्म: इस दिन शिष्य अपने गुरुओं के आश्रम या घर जाकर उनके चरणों का पूजन करते हैं और वर्ष भर के लिए उनका मार्गदर्शन प्राप्त करते हैं। बौद्ध धर्म: मान्यता है कि बुद्धत्व प्राप्त करने के बाद भगवान बुद्ध ने इसी तिथि पर सारनाथ में अपने प्रथम 5 शिष्यों को पहला उपदेश (धम्मचक्रप्पवत्तन) दिया था। जैन धर्म: जैन मान्यताओं के अनुसार, भगवान महावीर ने आषाढ़ पूर्णिमा के दिन ही अपने प्रथम शिष्य ‘गौतम स्वामी’ को अपना गणधर बनाया था। ‘गुरु’ शब्द का गूढ़ अर्थसंस्कृत में ‘गुरु’ शब्द दो ध्वनियों से मिलकर बना है:‘गु’ = अंधकार (अज्ञान)‘रु’ = प्रकाश (ज्ञान)अर्थात, जो मनुष्य को अज्ञानता के गहन अंधकार से निकालकर ज्ञान, विवेक और आत्म-साक्षात्कार के प्रकाश की ओर ले जाए, वही सच्चा गुरु है। गुरु पूर्णिमा की सरल एवं शास्त्रीय पूजन विधि यदि आप इस दिन अपने गुरु का पूजन कर रहे हैं, तो इस विधि का पालन करें: प्रातः स्नान व संकल्प: आषाढ़ पूर्णिमा के दिन प्रातःकाल सूर्योदय से पूर्व उठकर स्नान करें और स्वच्छ वस्त्र (संभव हो तो पीले वस्त्र) धारण करें।व्यास जी व इष्टदेव का ध्यान: सर्वप्रथम घर के पूजा स्थान पर महर्षि वेदव्यास, भगवान शिव (आदिगुरु) या अपने इष्टदेव का ध्यान करें। गुरु चरण प्रक्षालन: अपने गुरु के समक्ष बैठकर उनके चरणों को स्वच्छ जल या गंगाजल से धोएं और पोंछें। (यदि गुरु प्रत्यक्ष उपलब्ध न हों, तो उनकी पादुका या चित्र का पूजन करें)। तिलक व माल्यार्पण: गुरु को चंदन या रोली का तिलक लगाएं, अक्षत अर्पित करें और पुष्पमाला पहनाएं। वस्त्र व दक्षिणा अर्पण: अपनी श्रद्धा अनुसार गुरु को पीले वस्त्र, फल, मिष्ठान और दक्षिणा भेंट करें। आशीर्वाद एवं आरती: गुरु की आरती उतारें, उनके चरण स्पर्श कर आशीर्वाद लें और उन्हें चरणामृत व प्रसाद अर्पित करें। आधुनिक जीवन में गुरु पूर्णिमा का संदेश आज के डिजिटल और सूचना-प्रधान युग में ज्ञान की कोई कमी नहीं है, लेकिन ‘ज्ञान’ और ‘विवेक’ के बीच अंतर समझाना केवल एक गुरु के बस की बात है। यह पर्व हमें सिखाता है कि जीवन में कितनी भी सफलता क्यों न मिल जाए, अपने मार्गदर्शकों के प्रति विनम्रता, कृतज्ञता और सम्मान का भाव हमेशा बना रहना चाहिए। यही संस्कार हमारे चरित्र का निर्माण करते हैं। निष्कर्ष:गुरु पूर्णिमा का यह पावन दिन हमें याद दिलाता है कि बिना गुरु के जीवन में सही दिशा मिलना असंभव है। इस गुरु पूर्णिमा पर आइए हम अपने गुरुओं के दिखाए सत्य, धर्म और करुणा के मार्ग पर चलने का संकल्प लें। –आचार्य पं गिरीश पाण्डेय Post Views: 10 Please Share With Your Friends Also Post navigation आकाशीय बिजली का कहर! खेत में काम कर रहे दो किसानों समेत तीन की मौत, पांच झुलसे…