खंभों पर लटक रही मौत और फाइलों में उलझा नियामक आयोग, छत्तीसगढ़ में बिजली बिल हर साल बढ़ते हैं, लेकिन जान की सुरक्षा किसके भरोसे
रायपुर :- छत्तीसगढ़ में बिजली उपभोक्ताओं के लिए हर साल बढ़ते बिल अब आम बात हो चुकी है। छत्तीसगढ़ राज्य विद्युत नियामक आयोग बिजली दरों में बढ़ोतरी के मामलों में जितनी तत्परता दिखाता है, उतनी ही उदासीनता वह बिजली विभाग से जुड़ी जनसुरक्षा संबंधी शिकायतों पर बरतता नजर आ रहा है। इसका ताजा उदाहरण पूरे प्रदेश में बिजली के खंभों पर लगे खुले वितरण बॉक्स हैं, जो लगातार जानलेवा साबित हो रहे हैं। प्रदेश के शहरी और ग्रामीण इलाकों में सैकड़ों की संख्या में ऐसे वितरण बॉक्स खुले पड़े हैं।
इनमें कई बॉक्सों के दरवाजे गायब हैं, तो कई में खुले तार झूलते नजर आते हैं। इनसे आए दिन मवेशियों और आवारा पशुओं की करंट लगने से मौत हो रही है। यह खतरा सिर्फ जानवरों तक सीमित नहीं है, बल्कि राहगीरों, दोपहिया और चारपहिया वाहन चालकों के लिए भी किसी बम से कम नहीं है।विशेषज्ञों का मानना है कि यदि कोई वाहन अनियंत्रित होकर ऐसे वितरण बॉक्स से टकरा जाए, तो जनहानि की पूरी आशंका रहती है। बारिश के मौसम में यह खतरा कई गुना बढ़ जाता है, जब खुले बॉक्स और नमी मिलकर करंट फैलने का कारण बनते हैं।
आयोग का आदेश, फिर भी हालात जस के तस
इस गंभीर मुद्दे को लेकर रायपुर निवासी नितिन सिंघवी ने छत्तीसगढ़ राज्य विद्युत नियामक आयोग को पत्र लिखकर स्थिति से अवगत कराया था। आयोग ने मामले को संज्ञान में लेते हुए 24 नवंबर 2025 को छत्तीसगढ़ स्टेट पावर डिस्ट्रीब्यूशन कंपनी लिमिटेड के कार्यपालक निदेशक (संचालन एवं संधारण) को आवश्यक कार्रवाई करने के निर्देश दिए थे। साथ ही यह भी कहा गया था कि की गई कार्रवाई की जानकारी आयोग को दी जाए।
लेकिन हैरानी की बात यह है कि एक महीने से अधिक समय बीत जाने के बावजूद न तो प्रदेश में स्थिति सुधरी और न ही आयोग को किसी ठोस कार्रवाई की रिपोर्ट सौंपी गई। आज भी शहरों से लेकर गांवों तक खुले वितरण बॉक्स लोगों की जान के लिए खतरा बने हुए हैं।
सुधार के नाम पर लापरवाही
नितिन सिंघवी का आरोप है कि बिजली विभाग के कर्मचारी मरम्मत या सुधार कार्य के दौरान वितरण बॉक्स खोल तो देते हैं, लेकिन बिना बंद किए ही मौके से चले जाते हैं। खुले रहने के कारण कई बॉक्सों के दरवाजे चोरी तक हो चुके हैं, जिससे समस्या और गंभीर हो गई है। सिंघवी का कहना है कि यह सिर्फ तकनीकी लापरवाही नहीं, बल्कि सीधी-सीधी आपराधिक उदासीनता है। उन्होंने मांग की है कि पूरे प्रदेश में तत्काल प्रदेश स्तरीय अभियान चलाकर सभी खुले वितरण बॉक्स को सुरक्षित किया जाए और भविष्य में ऐसी लापरवाही रोकने के लिए सख्त निगरानी व्यवस्था बनाई जाए।
नियामक आयोग की भूमिका पर सवाल
सबसे बड़ा सवाल यह है कि जब आयोग ने खुद निर्देश जारी किए, तो उनके पालन की निगरानी क्यों नहीं की गई? क्या नियामक आयोग की भूमिका सिर्फ बिजली दरें बढ़ाने तक सीमित है?यदि आयोग जनहित से जुड़े मामलों में भी उतनी ही सक्रियता दिखाए, जितनी वह टैरिफ निर्धारण में दिखाता है, तो शायद ऐसी लापरवाहियां समय रहते सुधारी जा सकती थीं। जनता का मानना है कि यदि किसी दुर्घटना में किसी व्यक्ति की जान जाती है, तो उसकी जिम्मेदारी केवल बिजली विभाग की नहीं, बल्कि निगरानी में विफल रहे नियामक तंत्र की भी होगी।