क्षेत्र की प्रख्यात पहाड़ी माता के रूप में प्रसिद्ध देवी का दर्शन पूजन करने हजारों की संख्या में पहुंचते है श्रद्धालु

– चांदनी-बिहारपुर क्षेत्र के महुली गांव में स्थित प्राचीन गढ़वतिया मां दुर्गा मंदिर में मूलभूत सुविधाओं की कमी के चलते श्रद्धालुओं को काफी परेशानी का सामना करना पड़ रहा है। जिला मुख्यालय से लगभग 125 किलोमीटर दूर गढ़वतिया पहाड़ पर स्थित इस मंदिर में हर साल चैत्र और शारदीय नवरात्र के अवसर पर हजारों श्रद्धालु दर्शन के लिए उमड़ते हैं, लेकिन मंदिर परिसर में बिजली, पानी और सीढ़ियों जैसी आवश्यक सुविधाओं का अभाव है।

श्रद्धालुओं को हो रही दिक्कतें

गढ़वतिया धाम में श्रद्धालुओं को मंदिर तक पहुंचने के लिए काफी संघर्ष करना पड़ता है। पहाड़ पर चढ़ने के लिए सीढ़ियों की कमी है, जिससे वृद्ध और महिलाओं के लिए यहां पहुंचना कठिन हो जाता है। कुछ साल पहले ग्रामीणों ने सामूहिक रूप से धनराशि इकट्ठा कर कुछ सीढ़ियां बनवाई थीं, लेकिन वे अधूरी होने के कारण समस्या अब भी बनी हुई है। यहां बिजली और पानी की भी कोई व्यवस्था नहीं है, जिससे श्रद्धालुओं को दिन और रात में कई असुविधाओं का सामना करना पड़ता है।

प्राचीन मूर्तियों का संरक्षण न होने से हो रही क्षति

गढ़वतिया पहाड़ पर प्राचीन मूर्तियों का भंडार है, जो 9वीं से 12वीं सदी के बीच के माने जाते हैं। इन ऐतिहासिक मूर्तियों में शिव, गणेश, हनुमान, महिषासुर मर्दनी और अन्य देवी-देवताओं की प्रतिमाएं शामिल हैं। हालांकि, प्रशासन की उदासीनता और संरक्षण की कमी के चलते इनमें से कई मूर्तियां टूट चुकी हैं और अव्यवस्थित रूप से बिखरी हुई हैं। ग्रामीणों ने प्रशासन से बार-बार मूर्तियों के संरक्षण की मांग की है, लेकिन अब तक कोई ठोस कदम नहीं उठाया गया है।

दर्शनीय स्थल की अनदेखी

गढ़वतिया धाम एक दर्शनीय स्थल है, जो प्राकृतिक सुंदरता और ऐतिहासिक धरोहरों का मेल है। यहां पहाड़ पर स्थित शिवलिंग और काले पत्थरों से निर्मित स्तंभ विशेष आकर्षण का केंद्र हैं। इन स्तंभों में उमा महेश के उपासक, सूर्य, चांद और अन्य धार्मिक प्रतीक उकेरे गए हैं, जो इसे 9वीं से 12वीं सदी का धरोहर बनाते हैं। इसके बावजूद, इस स्थल को आज तक दर्शनीय स्थल के रूप में मान्यता नहीं दी गई है। ग्रामीणों की मांग है कि इसे पुरातत्व विभाग को सौंपकर संरक्षित किया जाए, ताकि यह धरोहर आने वाली पीढ़ियों के लिए संरक्षित रह सके।

गढ़वतिया धाम का ऐतिहासिक महत्व

गढ़वतिया पहाड़ पर राजा बालम ने एक किला और मंदिर का निर्माण कराया था। राजा खैरवार जाति के थे और इस पहाड़ी पर स्थित देवी की पूजा उसी जाति के बैगा करते हैं। धाम के मुख्य पुजारी सोमारसाय बैगा और जगमोहन ने बताया कि यहां माता के दरबार में आने वाले श्रद्धालुओं की सभी मनोकामनाएं पूर्ण होती हैं। इसी आस्था के कारण, यहां हर साल नवरात्र में मेले का आयोजन किया जाता है और श्रद्धालुओं की भारी भीड़ उमड़ती है।

धरोहर स्थल के रूप में पहचान की मांग

गढ़वतिया पहाड़ के साथ-साथ महुली गांव में स्थित सीता लेखनी पहाड़ के शिलालेख, लक्ष्मण पंजा, चपदा गांव की गुफा, जोगी माड़ा और कुदरगढ़ के शैलचित्र भी क्षेत्र की ऐतिहासिक धरोहरों में शामिल हैं। ग्रामीणों ने प्रशासन से इन सभी स्थलों को संरक्षित करने और गढ़वतिया धाम को एक आधिकारिक दर्शनीय स्थल घोषित करने की मांग की है। उनका कहना है कि इससे न केवल इन धरोहरों का संरक्षण हो सकेगा, बल्कि पर्यटन को भी बढ़ावा मिलेगा।

अवशेष और पुरातात्विक धरोहरें

गढ़वतिया पहाड़ी पर 10वीं शताब्दी के पुरातात्विक अवशेष भी मिले हैं। यहां काले पत्थरों से बने कई स्तंभ पाए गए हैं, जो अब खाई में बिखरे पड़े हैं। इनमें से कुछ स्तंभ सुरक्षित स्थिति में हैं, लेकिन बाकी समय और सुरक्षा के अभाव में नष्ट होते जा रहे हैं। ग्रामीणों का कहना है कि यदि प्रशासन इन धरोहरों का संरक्षण नहीं करेगा, तो यह ऐतिहासिक महत्व के अवशेष धीरे-धीरे पूरी तरह नष्ट हो जाएंगे।

सरकार और प्रशासन से अपेक्षाएं

ग्रामीणों ने जिला प्रशासन से गढ़वतिया धाम में मूलभूत सुविधाओं जैसे बिजली, पानी, और सीढ़ियों की व्यवस्था करने की मांग की है। साथ ही, उन्होंने कलेक्टर से प्राचीन मूर्तियों और स्थलों का संरक्षण करने के लिए आवश्यक कदम उठाने की भी अपील की है। प्रशासन से अपेक्षा है कि वह इस ऐतिहासिक स्थल को संरक्षित कर इसे एक पर्यटन केंद्र के रूप में विकसित करेगा, ताकि न केवल यहां की धरोहरें बच सकें, बल्कि क्षेत्र का विकास भी हो सके।

गढ़वतिया धाम, जो अपनी प्राचीनता और धार्मिक महत्व के लिए जाना जाता है, आज सुविधाओं के अभाव और प्रशासन की उपेक्षा के कारण कठिन दौर से गुजर रहा है।

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By Chhattisgarh Kranti

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