कैसे शुरू हुई यह मजेदार परंपरा?
इस अनोखी परंपरा की शुरुआत निजामशाही के दौर में हुई थी. उस समय विदा गांव पर जहांगीरदार आनंदराव देशमुख का शासन था. कहानी के मुताबिक, एक बार उन्होंने अपने दामाद के साथ मजाक करने के लिए उसे गधे पर बैठाया और पूरे गांव में घुमा दिया. इस घटना ने गांव वालों को इतना हंसा दिया कि उन्होंने इसे हर साल दोहराने का फैसला कर लिया. तब से लेकर आज तक यह परंपरा चली आ रही है और अब यह पूरे महाराष्ट्र में मशहूर हो चुकी है.

दामाद के लिए मजाक या सम्मान?
पहली नजर में यह परंपरा एक मजाक लग सकती है, लेकिन गांववालों का मानना है कि यह सम्मान देने का एक अनोखा तरीका है. जुलूस में पूरा गांव शामिल होता है, लोग हंसी-मजाक करते हैं, ढोल-नगाड़े बजते हैं और एक तरह से पूरे गांव में उत्सव का माहौल बन जाता है. लेकिन एक दिलचस्प नियम यह भी है कि किसी भी दामाद को यह अनुभव दोबारा नहीं मिलता. यानी, जिसने एक बार गधे पर सवारी कर ली, उसे फिर से यह परंपरा झेलनी नहीं पड़ती.

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By Chhattisgarh Kranti

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